न तू ज़मीं के लिए - Na Tu Zameen Ke Liye (Md. Rafi)

Music/Album: दास्तान (1970)
Music By: लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल
Lyrics By: साहिर लुधियानवी
Performed By: मो.रफ़ी

न तू ज़मीं के लिए
है न आसमां के लिए
तेरा वजूद है
अब दास्ताँ के लिए

पलट के सु-ए-चमन
देखने से क्या होगा
वो शाख ही ना रही
जो थी आशियाँ के लिए
ना तू ज़मीं...

गरज परस्त जहां में
वफ़ा तलाश न कर
ये शय बनी थी किसी
दूसरे जहां के लिए
तेरा वजूद...

6 comments :

  1. गरज परस्त जहां में
    वफ़ा तलाश न कर
    ये शय बनी थी किसी
    दूसरे जहां के लिए

    Wah ! is gane ke sare bol likh kar aapne bada achcha kam kiya .

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  2. Zabardast. I listen to this song atleast 20 times in repeat every time and never get tired. Rafi saab was some God.!!!

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  3. तेरा वजूद है अब
    सिर्फ़ दास्ताँ के लिए।
    Make the necessary ammends to the spellings.

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  4. पलट के सू-ए-चमन देखने से क्या होगा
    ये शय बनी थी किसी दूसरे जहां के लिए।

    साहिर लुधियानवी जी ने बहुत खूब लिखा है कि उस बाग की ओर पलट के देखने से अब क्या फायदा वह डाली ही टूट गयी है जिस पर हम आशियाँ बना सकते थे भाव है कि अब प्रेम शेष ही नहीं रहा तो उस तरफ देख के हासिल क्या होगा?

    यहीं मुझे फ़राज़ की ग़ज़ल की पंक्तियाँ याद आ गयीं-

    जान पहचान से ही क्या होगा
    फिर भी ऐ दोस्त गौर कर शायद

    फिर इसी राहगुज़र पर शायद
    हम कभी मिल सकें मगर शायद

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  5. साहिर लुधियानवी जी ने बहुत खूब लिखा है कि उस बाग की ओर पलट के देखने से अब क्या फायदा वह डाली ही टूट गयी है जिस पर हम आशियाँ बना सकते थे भाव है कि अब प्रेम शेष ही नहीं रहा तो उस तरफ देख के हासिल क्या होगा?

    यहीं मुझे फ़राज़ की ग़ज़ल की पंक्तियाँ याद आ गयीं-

    जान पहचान से ही क्या होगा
    फिर भी ऐ दोस्त गौर कर शायद

    फिर इसी राहगुज़र पर शायद
    हम कभी मिल सकें मगर शायद

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