Music By: विजय वर्मा
Lyrics By: राजेश मंथन
Performed By: राजा हसन
हाथों से यूँ, छूटे हैं क्यों
धागे जुनून के, टूटे से हैं क्यूँ
ये हौंसले, रूठे हैं क्यूँ
हैं ख़्वाब सारे, झूठें से क्यूँ
किसी घाट पे किसी दीप सा
जलता हूँ मैं जैसा चिता
किसी राख में फल मोक्ष का
शव होके ही मिलता शिवा
मैं हो रहा, खुद में शिवाला
बाकी अभी, मुझमें उजाला
खुद में यकीं फिर से है देखा
बदलूँगा मैं किस्मत की रेखा
आने को है फिर से सवेरा
जाने को है गहरा अँधेरा
जिस मोड़ से रुख मोड़ के
निकला था मैं आया फिर से वहीं
उम्मीद की हर रोशनी धुंधली हुई
पलकों में ठहरी नमी
इस दर्द की लहरों का क्या
ना गिनती है ना है सिरा
मुझे डर नहीं तूफ़ान का
डूबा है जो वो तर गया
मैं हो रहा, खुद में शिवाला...
कुछ इस तरह मैं चुप रहा
हर गम सहा रोना तो आया नहीं
बेइंतेहा हैरान सा
तन्हा रहा शिकवा किया ना कहीं
जो था मेरा वो खो गया
जो खो गया अफ़सोस क्या
तकलीफ़ से अंजान सा
मैं ज़िन्दगी जीता रहा
मैं हो रहा, खुद में शिवाला...
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