Music By: उस्ताद ग़ुलाम मुस्तफ़ा ख़ान
Lyrics By: अब्दुल हक़ अंजुम
Performed By: हरिहरन
ख़ुद को बेहतर है सराबों में भटकता देखूँ
वरना वो प्यास है मर जाऊँ जो दरिया देखूँ
ख़ुद को बेहतर है...
मैं हूँ तक़दीर की ज़ुल्मत का मुसाफ़िर तन्हा
रोशनी हो तो कहीं अपना ही साया देखूँ
वरना वो प्यास...
आईना देता है एहसास अधूरेपन का
तू जो मिल जाए तो मैं अपना सरापा देखूँ
वरना वो प्यास...
मेरी परवाज़ की मंज़िल भी ख़ला है 'अंजुम'
ख़ुद को हालात की सूली पे लटकता देखूँ
वरना वो प्यास...
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