Music By: उस्ताद ग़ुलाम मुस्तफ़ा ख़ान
Lyrics By: मुमताज़ राशिद
Performed By: हरिहरन
पत्थर सुलग रहे थे कोई नक़्श-ए-पा न था
हम जिस तरफ़ चले थे उधर रास्ता न था
पत्थर सुलग रहे थे...
यूँ देखती है गुमशुदा लम्हों के मोड़ से
इस ज़िन्दगी से जैसे कोई वास्ता न था
हम जिस तरफ़...
परछाइयों के शहर की तन्हाइयाँ न पूछ
अपना शरीक़-ए-ग़म कोई अपने सिवा न था
हम जिस तरफ़...
पत्तों के टूटने की सदा घुट के रह गई
जंगल में दूर-दूर हवा का पता न था
हम जिस तरफ़...
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